गगन स्वप्न
यूँ पंख पसार उड़ चला है तू
तो नभ में मिलेंगे दृश्य अनेक
मौसम भी परिवर्तन लेंगे
बिजली टूटेगी प्रहर हरेक
सूरज की ताप जो पड़े तुझपे
नतमस्तक हो बढ़ जाना तू
आये जब तूफ़ाँ टकराने
नये करतब फ़िर दिखलाना तू
बस डरना थमना रूकना मत
हो मंज़र कोई तेरे आगे
सागर है तू कुछ दूर तो चल
हर किनारे के हैं तुझसे नाते
बहुत सुंदर रचना।।god bless you☺
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना।।god bless you☺
ReplyDeleteThank you so much 😊🙏🙏
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