यादों की बारिश

वो हवा भी खुशनुमा थी
कि जिसमें तुम्हारा अक्स था,
वो मौसम भी महफ़ूज़ था
कि तूफ़ाँ आते और तुममे जीवन कमज़र्फ़ था,
हँसने की वजह भी तब शुमार ना थी
कि जिसमें तेरी ख़ामोशियों का मंज़र गर्म था|

चले जाते हैं लोग दूर यूँ
कि जैसे साँसों से उनका कोई मर्म ना था,
हम याद करके झर जाते हैं यूँ
जैसे तेरा तराना मुद्दतों बाद भी मेरा ही स्वप्न था|


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