यूँ पंख पसार उड़ चला है तू तो नभ में मिलेंगे दृश्य अनेक मौसम भी परिवर्तन लेंगे बिजली टूटेगी प्रहर हरेक सूरज की ताप जो पड़े तुझपे नतमस्तक हो बढ़ जाना तू आये जब तूफ़ाँ टकराने ...
तू ख़ामोश है, तू नींव का पत्थर है तू झुका है, तू फलों से लदा वृक्ष है ईत्मीनान है उनमे, जिनमें अभिमान नहीं हैं गर्व से फूले वही, जिन्हें इस सत्य का अनुमान नहीं
वो हवा भी खुशनुमा थी कि जिसमें तुम्हारा अक्स था, वो मौसम भी महफ़ूज़ था कि तूफ़ाँ आते और तुममे जीवन कमज़र्फ़ था, हँसने की वजह भी तब शुमार ना थी कि जिसमें तेरी ख़ामोशियों का मंज़र गर्म था| चले जाते हैं लोग दूर यूँ कि जैसे साँसों से उनका कोई मर्म ना था, हम याद करके झर जाते हैं यूँ जैसे तेरा तराना मुद्दतों बाद भी मेरा ही स्वप्न था|